03/10/2024
प्रशांत किशोर ने 2 अक्तूबर को महात्मा गांधी (और लाल बहादुर शास्त्री की भी) की जयंती के मौके पर पार्टी लॉन्च कर अपने जन सुराज अभियान को औपचारिक रूप से राजनीतिक अभियान में बदल दिया है.
इस तरह यह तय हो गया है कि 2025 के विधानसभा चुनाव में बिहार की जनता के सामने एक नया विकल्प भी होगा.
एक नए विकल्प के साथ सवाल यह भी होगा कि इस विकल्प पर जनता कितना भरोसा दिखाती है? यह भी कि उसे भरोसा क्यों दिखाना चाहिए और क्यों नहीं दिखाना चाहिए? दूसरे शब्दों में कहें तो करीब 35 साल से लालू-नीतीश के ही साये में रहती आ रही बिहार की जनता को प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी से उम्मीदें पालनी या नहीं पालनी चाहिए? और क्यों? पहले इस पर बात करते हैं कि क्यों उम्मीदें पालनी चाहिए?
1. नया विकल्प, मौका देकर देखते हैं
1990 से बिहार का शासन लालू और नीतीश, इन्हीं दो नेताओं पर केंद्रित रहा है. ऐसे में एक नया विकल्प आया है, और पूरा होमवर्क करके आया है तो उसे पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता है. 'वोट देकर देखते हैं'- इस सोच से देखें तो लोग प्रशांत किशोर से उम्मीद कर सकते हैं.
2.जरूरी मुद्दों की बात
प्रशांत किशोर ने जिन मुद्दों को उठाया है, वे आज बिहार की जनता की असली समस्या से जुड़े मुद्दे हैं. बिहार के बच्चे पढ़ने के लिए बाहर जा रहे हैं और नौजवान नौकरी के लिए. गांवों में वैसे बुजुर्गों की संख्या बढ़ रही है, जिनके घर में देखभाल के लिए कोई नहीं रह गया है. खेती की लागत बढ़ने और मुनाफा घटते जाने से किसान परेशान हैं.
इन परिस्थितियों में प्रशांत किशोर ने शिक्षा, रोजगार, बुजुर्गों को प्रतिमाह 2 हजार रुपए की पेंशन, महिलाओं को रोजगार के लिए सस्ता कर्ज और खेती को फायदे का काम बनाने का वादा कर घर-घर की जरूरत का ख्याल रखा है. किशोर वादा पूरा करने का जो प्लान बता रहे हैं, वह भी पहली नजर में जनता को हवा-हवाई लगे, ऐसा नहीं है. इसलिए भी वह जनता को अपने ऊपर भरोसा करने का एक कारण दे रहे हैं.
3.राजनीतिक पहल को भी जनअभियान से जोड़ा
इसमें कोई शक नहीं है कि जन सुराज अभियान शुरू करने के पीछे का मकसद शुरू से ही राजनीति करना रहा था. लेकिन, प्रशांत किशोर ने इसे जन अभियान का रूप देते हुए आगे बढ़ाया. वह पदयात्रा निकालते हुए पूरे बिहार में जनता के बीच गए और एक संदेश दिया कि वह नई तरह की राजनीति करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसके केंद्र में जनता ही होगी. साथ ही, चुनाव से पहले माहौल बनाने में भी इससे मदद मिली.
4.राजनीतिक पार्टी का स्वरूप
प्रशांत किशोर ने राजनीतिक पार्टी का जो स्वरूप रखा है, उसमें भी इस बात का ध्यान रखा है कि जनता को एक उम्मीद दिखे और 'नई तरह की राजनीति' करने का उनका दावा भी सच दिखे. उन्होंने मनोज भारती को जन सुराज पार्टी का पहला कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जो भारतीय विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी हैं और आईआईटी से पढ़े हैं. किशोर ने जाति का भी ख्याल रखते हुए अनुसूचित जाति का कार्यकारी अध्यक्ष चुना. उन्होंने अध्यक्ष का कार्यकाल भी एक साल का ही रखने का प्रावधान रखा.
5.राइट टु रिकॉल का अधिकार देने वाला पहला दल
प्रशांत किशोर ने जो सबसे अनोखी बात कही वह 'राइट टु रिकॉल' का अधिकार देने की बात कही. यह अधिकार अभी जनता को किसी रूप में कहीं से नहीं मिला है. न सरकार से, न ही किसी पार्टी से. प्रशांत किशोर ने कहा कि उनकी पार्टी के उम्मीदवारों का चयन भी जनता करेगी और विधायकों का काम पसंद नहीं आने पर सदन का कार्यकाल खत्म होने से पहले ही उन्हें हटवा भी सकेगी.
व्यावहारिक रूप में प्रशांत किशोर इस व्यवस्था को अमल में कैसे लाएंगे, यह वक्त बताएगा. लेकिन, इसकी बात कर उन्होंने जहां जनता के बीच अपनी पार्टी को चर्चा का विषय बनाए रखने की कोशिश की है, वहीं मतदाताओं को उम्मीद पालने का एक और कारण भी दिया है.
6.आंकड़ों में उम्मीद
प्रशांत किशोर कहते हैं कि जन सुराज के साथ पहले दिन से ही एक करोड़ लोग जुड़े हैं, जबकि भाजपा मात्र 66 लाख सदस्य होने का दावा करती है. आंकड़ों के हिसाब से प्रशांत किशोर अपने लिए अभी से उम्मीद दिखा रहे हैं. 2020 के चुनाव में भाजपा को करीब 37 लाख वोट मिले थे. इस लिहाज से अभी से एक करोड़ सदस्य बना लेने का दावा करने वाले प्रशांत किशोर के लिए तो पटना दूर नहीं लगता है.
बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में कुल 7,36,47,660 मतदाता थे. कुल 4,14,36,553 वैध मत पड़े थे. इनमें से सबसे ज्यादा 55,23,482 (23.45 प्रतिशत) वोट राजद को मिले थे. इसके बाद जदयू और भाजपा का नंबर था. 48,19,163 (20.46 प्रतिशत) वोट जदयू और 36,85,510 (15.64 प्रतिशत) मत भाजपा को मिले थे.