16/01/2021
“भगवान् श्रीशिवजी द्वारा श्रीराम-स्तुति”
छन्द :
मामभिरक्षय रघुकुल नायक । धृत बर चाप रुचिर कर सायक ।।
मोह महा घन पटल प्रभंजन । संसय बिपिन अनल सुर रंजन ।।
अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर । भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर ।।
काम क्रोध मद गज पंचानन । बसहु निरंतर जन मन कानन ।।
बिषय मनोरथ पुंज कंज बन । प्रबल तुषार उदार पार मन ।।
भव बारिधि मंदर परमं दर । बारय तारय संसृति दुस्तर ।।
स्याम गात राजीव बिलोचन । दीन बंधु प्रनतारति मोचन ।।
अनुज जानकी सहित निरंतर । बसहु राम नृप मम उर अंतर ।।
मुनि रंजन महि मंडल मंडन । तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन ।।(मानस ६/११५)
भावार्थ : हे रघुकुलके स्वामी ! सुंदर हाथोंमें श्रेष्ठ धनुष और सुंदर बाण धारण किए हुए आप मेरी रक्षा कीजिए । आप महामोहरूपी मेघसमूहके (उड़ानेके) लिए प्रचंड पवन हैं, संशयरूपी वनके (भस्म करनेके) लिए अग्नि हैं और देवताओंको आनंद देने वाले हैं । आप निर्गुण, सगुण, दिव्य गुणोंके धाम और परम सुंदर हैं । भ्रमरूपी अंधकारके (नाशके) लिए प्रबल प्रतापी सूर्य हैं । काम, क्रोध और मदरूपी हाथियोंके (वधके) लिए सिंहके समान आप इस सेवकके मनरूपी वनमें निरंतर वास कीजिए । विषयकामनाओंके समूह रूपी कमलवनके (नाशके) लिए आप प्रबल पाला हैं, आप उदार और मनसे परे हैं । भवसागर (को मथने)के लिए आप मंदराचल पर्वत हैं । आप हमारे परम भयको दूर कीजिए और हमें दुस्तर संसार सागरसे पार कीजिए । हे श्यामसुंदर-शरीर! हे कमलनयन! हे दीनबंधु! हे शरणागतको दु:खसे छुड़ाने वाले! हे राजा रामचन्द्रजी! आप छोटे भाई लक्ष्मण और जानकीजी सहित निरंतर मेरे हृदयके अंदर निवास कीजिए । आप मुनियोंको आनंद देनेवाले, पृथ्वीमंडलके भूषण, तुलसीदासके प्रभु और भयका नाश करने वाले हैं ।
(गीताप्रेस गोरखपुर)