बच्चे के रूप में भगवान खुद अवतरित होते है २,४,५,साल तक माँ बाप के प्यार के स्वर्ग में दुनिया को देख ते है और जब समाज में वो बच्चा आता है धीरे धीरे दानव बनता जाता है ३५ - ४० साल बाद जब वापस इन्सान जागृत होता है तो समज में आता है की दुनिया स्वर्ग भी है और नरक भी और कई ओ को तो पूरी ज़िन्दगी जागरूकता आती ही नहीं वो पूरी ज़िन्दगी एक के बाद एक भ्रम में गुजारदेते है और जो परम तत्त्व को समजने की कोसिस में ध
ीरे धीरे जागृत होते जाते है वो या तो जीवन छोड़ देते है या दुसरो को जगाने में जीवन बिताते है मगर उससे समाज में कोई ज्यादा बदलाव नहीं आता सिर्फ उस इन्सान के मन को लगने लगता है की वो एक अच्छा काम करने लगा है सांस लेना और छोड़ ना इन्सान का सबसे पहला और आखरी भी कर्म होता है इन्सान के मन में उत्पन हुवे एक के बाद एक ख्याल और उन खयालो से उत्पन हुवे कर्म एक भ्रम का निर्माण करता जाता है और धीरे धीरे वही उसका जीवन बनता चला जाता है लोगो का समूह और उसका खुदका मन धिरे धीरे उसे स्वीकार करेने लगता है मगर उससे कही ये साबित नहीं होता की वो सही है या गलत वो तो वो छोटा सा इंसानों का जुंड उसे ये मनवा देता है की वो सही है और सामने दुसरे समूह को वो गलत लगता है उसे अपना कर्म सही लगता है ..... सबसे बड़ा सवाल तो वही का वही रहता है की उसे इस दुनिया में क्यों भेजा गया है वो कौन है क्यों है ये सवाल अंतर्मन हर किसी को जागृत होने के बाद सताता रहता है मगर ये खुद के मन का सवाल खुद में ही रहता है और मौत तक वो सवाल वही का वही रहता है मौत के बाद वो मन के सवाल के साथ आत्मा दूसरा जन्म लेती है वापस जागृत होता है और वाही सवालों के जवाब ढूँढ ने में जीवन बिताता है सायद इसी लिए इन्सान को मन दिया है की वो पूरी ज़िन्दगी खयालो से सवालों में उल्जा रहे और अगर मुक्त होना चाहे तो अंतर्मन और मन से जुड़े इंसानों का समूह उसे वापस खिचता रहे मुक्त होना असंभव है और सायद यही इन्सान नाम के अदभुत जानवर का जीवन होता होगा ये हमारा ख्याल है सच और जूठ के पलडो से तोलने की कोसिस मत करना मिरिंडा पागल पंथी भी ज़रूरी है माफ़ करना दोस्तों अगर किसी के मन को बुरा लगे तो https://www.facebook.com/rajkotsoul/